विस्तृत उत्तर
त्याजक पितृ वह है जो पहले आदित्य स्थान पर था, अर्थात यजमान का वृद्ध-प्रपितामह या उससे ऊपर का पूर्वज, और सपिण्डीकरण की नई पदोन्नति के बाद मुख्य पिण्डभाज् वर्ग से बाहर हो जाता है। गरुड़ पुराण में इस चतुर्थ अवस्था को त्याजक कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि वह आत्मा आदित्य लोक की सीमा छोड़कर उच्चतर लोकों में गमन कर जाती है, मोक्ष प्राप्त कर लेती है, या अपने कर्मानुसार किसी नवीन योनि को पूर्णतः अंगीकार कर लेती है। इसके बाद उसे वार्षिक मुख्य पार्वण श्राद्ध में प्रत्यक्ष पिण्ड नहीं दिया जाता, बल्कि वह लेपभाज् की सूक्ष्म श्रेणी में आता है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





