विस्तृत उत्तर
दक्षिण भारत की वैदिक परंपरा में एक कांस्य या चांदी की थाली में चावल (अक्षत) फैलाए जाते हैं। पिता या गुरु बच्चे की तर्जनी उंगली पकड़कर चावलों पर मातृभाषा के वर्णमाला के अक्षर या 'ॐ' लिखवाते हैं।
पूर्वी भारत (बंगाल/असम) में पुरोहित या माता-पिता बच्चे का हाथ पकड़कर स्लेट या रेत पर पहला अक्षर लिखवाते हैं।
इसके पश्चात्, एक अत्यंत सूक्ष्म तांत्रिक प्रक्रिया के अंतर्गत, स्वर्ण (सोने) की अंगूठी या शलाका को शुद्ध शहद (Honey) में डुबोकर बच्चे की जिह्वा (जीभ) पर बीज मंत्र या 'ॐ हरि श्री गणपतये नमः' लिखा जाता है।
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