विस्तृत उत्तर
प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में सरस्वती को प्रारंभ में उत्तर-पश्चिम भारत में बहने वाली एक अत्यंत पवित्र और जीवनदायिनी नदी (सप्तसिंधु में से एक) के रूप में पूजा जाता था। हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने से वसंत ऋतु में इस नदी का जलस्तर बढ़ जाता था, और इसके तटों पर पीली सरसों के फूल खिल उठते थे, जो प्रकृति को एक स्वर्णिम आभा प्रदान करते थे।
मकर संक्रांति के पश्चात सूर्य अपनी उत्तरायण यात्रा आरंभ करता है, जिससे शीत ऋतु का शमन होता है और प्रकृति एक 40 दिवसीय संधिकाल में प्रवेश करती है। इसी संधिकाल के मध्य में वसंत पंचमी का पर्व मानव मस्तिष्क में सत्त्व गुण के विस्तार का मार्ग प्रशस्त करता है।
वसंत पंचमी केवल अकादमिक ज्ञान का नहीं, बल्कि प्रकृति में रचनात्मकता, प्रेम, और नव-सृजन (Creative Energy) के अंकुरण का भी पर्व है।
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