विस्तृत उत्तर
कुक्कुट प्रभात और जागरण का प्रतीक है, इसलिए कुक्कुटेश्वर लिंग ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 1 घंटा 36 मिनट पूर्व) की साधना का अधिष्ठात्री केंद्र है। इस समय सत्त्व गुण की प्रधानता होती है और मन शांत होता है। आयुर्वेद के अनुसार यह 'वात' का समय है जो प्राण को सुषुम्ना नाड़ी में प्रविष्ट कराने में सहायक है। आधुनिक योग-विज्ञान के अनुसार प्रातः 3:40 पर पीनियल ग्रंथि (तीसरा नेत्र/आज्ञा चक्र) अपने अधिकतम स्राव पर होती है। इस समय की साधना साधक को परमानंद और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ एकीकरण की स्थिति में ले जाती है। कुक्कुटेश्वर लिंग इसी तृतीय नेत्र के जागरण का तांत्रिक अधिष्ठान है। जो साधक ब्रह्म मुहूर्त में अज्ञान की निद्रा त्यागकर यहाँ साधना करता है, वह अनायास ही आत्मबोध प्राप्त कर लेता है।





