विस्तृत उत्तर
हठयोग के ग्रंथों (हठयोग प्रदीपिका और घेरण्ड संहिता) में वर्णित 'कुक्कुटासन' का मुख्य उद्देश्य मूलाधार चक्र का प्रबल उद्दीपन और प्रसुप्त कुण्डलिनी शक्ति का जागरण है। इस आसन के अभ्यास से साधक के भीतर से तमोगुण (आलस्य और प्रमाद) का समूल नाश होता है। कुक्कुटेश्वर लिंग की तांत्रिक साधना इसी यौगिक सिद्धांत का भौतिक मूर्तरूप है। यहाँ की उपासना साधक को तमो गुण की निद्रा से निकालकर उसकी प्राण-ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी (ऊपर की ओर) बनाती है। जिस प्रकार कुक्कुटासन में शरीर ऊपर उठता है, उसी प्रकार यह लिंग आत्मा के लौकिक बंधनों से ऊपर उठकर दिव्य चेतना की ओर आरोहण का प्रतीक है।





