विस्तृत उत्तर
वसु से रुद्र और रुद्र से आदित्य पदोन्नति सपिण्डीकरण की गतिशील प्रणाली में होती है। जब नया प्रेत पितृलोक में प्रवेश कर वसु बनता है, तब पितृ मण्डल में ऊपर की पीढ़ियाँ क्रमशः आगे बढ़ती हैं। जो पहले वसु था, अर्थात यजमान का पितामह, वह रुद्र बन जाता है। जो पहले रुद्र था, अर्थात यजमान का प्रपितामह, वह आदित्य बन जाता है। इस प्रकार हर नए सपिण्डीकरण के साथ पितृ श्रेणी में देव-वर्गों का क्रम बदलता है और आत्मा स्थूल वसु अवस्था से सूक्ष्म रुद्र तथा प्रकाशमय आदित्य अवस्था की ओर बढ़ती है।
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