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श्रीमद्भगवद्गीता · विश्वरूप दर्शन योग

श्लोक 52

विश्वरूप दर्शन योग · Vishwarupa Darshana Yoga

मूल पाठ

श्री भगवानुवाच | सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम | देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

श्रीभगवान् बोले -- मेरा यह जो रूप तुमने देखा है, इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ हैं। इस रूपको देखनेके लिये देवता भी नित्य लालायित रहते हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

श्रीभगवान् बोले -- मेरा यह जो रूप तुमने देखा है, इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ हैं। इस रूपको देखनेके लिये देवता भी नित्य लालायित रहते हैं।

English Meaning

The Blessed Lord said Very hard indeed it is to see this form of Mine which thou hast seen. Even the gods are ever longing to behold it.

The Blessed Lord said Very hard indeed it is to see this form of Mine which thou hast seen. Even the gods are ever longing to behold it.

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