श्री भगवानुवाच | मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते | श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः
अर्थ: मेरेमें मनको लगाकर नित्य-निरन्तर मेरेमें लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धासे युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।
भक्ति योग · Bhakti Yoga
अर्जुन उवाच | एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते | येचाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः
जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपमें लगे रहकर आप-(सगुण भगवान्-) की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निराकारकी ही उपासना करते हैं, उनमेंसे उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?
जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपमें लगे रहकर आप-(सगुण भगवान्-) की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निराकारकी ही उपासना करते हैं, उनमेंसे उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?
Arjuna said Those devotees who, ever steadfast, thus worship Thee and those also who worship the imperishable and the unmanifested which of them are better versed in Yoga?
Arjuna said Those devotees who, ever steadfast, thus worship Thee and those also who worship the imperishable and the unmanifested which of them are better versed in Yoga?
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