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श्रीमद्भगवद्गीता · भक्ति योग

श्लोक 4

भक्ति योग · Bhakti Yoga

मूल पाठ

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः | ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

English Meaning

Having restrained all the senses, even-minded everywhere, intent on the welfare of all beings verily they also come unto Me.

Having restrained all the senses, even-minded everywhere, intent on the welfare of all beings verily they also come unto Me.

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