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श्रीमद्भगवद्गीता · भक्ति योग

श्लोक 3

भक्ति योग · Bhakti Yoga

मूल पाठ

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते | सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

English Meaning

Those who worship the imperishable, the indefinable, the unmanifest, the omnipresent, the unthinkable, the immovable and the eternal.

Those who worship the imperishable, the indefinable, the unmanifest, the omnipresent, the unthinkable, the immovable and the eternal.

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