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श्रीमद्भगवद्गीता · भक्ति योग

श्लोक 19

भक्ति योग · Bhakti Yoga

मूल पाठ

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित् | अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीतउष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीतउष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

English Meaning

He to whom censure and praise are equal, who is silent, content with anything, homeless, of a steady mind, and full of devotion that man is dear to Me.

He to whom censure and praise are equal, who is silent, content with anything, homeless, of a steady mind, and full of devotion that man is dear to Me.

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