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श्रीमद्भगवद्गीता · श्रद्धात्रय विभाग योग

श्लोक 21

श्रद्धात्रय विभाग योग · Shraddhatraya Vibhaga Yoga

मूल पाठ

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः | दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

किन्तु जो दान प्रत्युपकारके लिये अथवा फलप्राप्तिका उद्देश्य बनाकर फिर क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

किन्तु जो दान प्रत्युपकारके लिये अथवा फलप्राप्तिका उद्देश्य बनाकर फिर क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है।

English Meaning

And, that gift which is given with a view to receive something in return, or looking for a reward, or reluctantly, is held to be Rajasic.

And, that gift which is given with a view to receive something in return, or looking for a reward, or reluctantly, is held to be Rajasic.

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