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श्रीमद्भगवद्गीता · कर्म योग

श्लोक 20

कर्म योग · Karma Yoga

मूल पाठ

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः | लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

राजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष भी कर्मके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं। इसलिये लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू (निष्कामभावसे) कर्म करनेके योग्य है।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

राजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष भी कर्मके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं। इसलिये लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू (निष्कामभावसे) कर्म करनेके योग्य है।

English Meaning

Janaka and others attained perfection verily by action only; even with a view to the protection of the masses thou shouldst perform action.

Janaka and others attained perfection verily by action only; even with a view to the protection of the masses thou shouldst perform action.

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