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श्रीमद्भगवद्गीता · ज्ञान विज्ञान योग

श्लोक 18

ज्ञान विज्ञान योग · Jnana Vijnana Yoga

मूल पाठ

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् | आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

पहले कहे हुए सब-के-सब भक्त बड़े उदार (श्रेष्ठ भाववाले) हैं। परन्तु ज्ञानी (प्रेमी) तो मेरा स्वरूप ही है -- ऐसा मेरा मत है। कारण कि वह युक्तात्मा है और जिससे श्रेष्ठ दूसरी कोई गति नहीं है, ऐसे मेरेमें ही दृढ़ आस्थावाला है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

पहले कहे हुए सब-के-सब भक्त बड़े उदार (श्रेष्ठ भाववाले) हैं। परन्तु ज्ञानी (प्रेमी) तो मेरा स्वरूप ही है -- ऐसा मेरा मत है। कारण कि वह युक्तात्मा है और जिससे श्रेष्ठ दूसरी कोई गति नहीं है, ऐसे मेरेमें ही दृढ़ आस्थावाला है।

English Meaning

Noble indeed are all these; but I deem the wise man as My very Self; for, steadfast in mind he is established in Me alone as the supreme goal.

Noble indeed are all these; but I deem the wise man as My very Self; for, steadfast in mind he is established in Me alone as the supreme goal.

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