ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता · ज्ञान विज्ञान योग

श्लोक 4

ज्ञान विज्ञान योग · Jnana Vijnana Yoga

मूल पाठ

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च | अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश -- ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार -- यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी 'अपरा' प्रकृति है। हे महाबाहो! इस अपरा प्रकृतिसे भिन्न जीवरूप बनी हुई मेरी 'परा' प्रकृतिको जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश -- ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार -- यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी 'अपरा' प्रकृति है। हे महाबाहो! इस अपरा प्रकृतिसे भिन्न जीवरूप बनी हुई मेरी 'परा' प्रकृतिको जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।

English Meaning

Earth, water, fire, air, ether, mind, intellect and egoism thus is My Nature divided eightfold.

Earth, water, fire, air, ether, mind, intellect and egoism thus is My Nature divided eightfold.

आगे पढ़ें — ज्ञान विज्ञान योग के सभी श्लोक · श्रीमद्भगवद्गीता