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श्रीमद्भगवद्गीता · ज्ञान विज्ञान योग

श्लोक 7

ज्ञान विज्ञान योग · Jnana Vijnana Yoga

मूल पाठ

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय | मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे धनञ्जय! मेरे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओत-प्रोत है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

हे धनञ्जय! मेरे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओत-प्रोत है।

English Meaning

There is nothing whatsoever higher than Me, O Arjuna. All this is strung on Me, as clusters of gems on a string.

There is nothing whatsoever higher than Me, O Arjuna. All this is strung on Me, as clusters of gems on a string.

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