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श्रीमद्भगवद्गीता · ज्ञान विज्ञान योग

श्लोक 5

ज्ञान विज्ञान योग · Jnana Vijnana Yoga

मूल पाठ

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् | जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश -- ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार -- यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है। हे महाबाहो! इस 'अपरा' प्रकृतिसे भिन्न मेरी जीवरूपा बनी हुुई मेरी 'परा' प्रकृतिको जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश -- ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार -- यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है। हे महाबाहो! इस 'अपरा' प्रकृतिसे भिन्न मेरी जीवरूपा बनी हुुई मेरी 'परा' प्रकृतिको जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।

English Meaning

This is the inferior Prakriti, O mighty-armed (Arjuna); know thou as different from it My higher Prakriti (Nature), the very life-element, by which this world is upheld.

This is the inferior Prakriti, O mighty-armed (Arjuna); know thou as different from it My higher Prakriti (Nature), the very life-element, by which this world is upheld.

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