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श्रीमद्भगवद्गीता · ज्ञान विज्ञान योग

श्लोक 20

ज्ञान विज्ञान योग · Jnana Vijnana Yoga

मूल पाठ

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः | तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

उन-उन कामनाओंसे जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है, ऐसे वे मनुष्य अपनी-अपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित होकर (देवताओंके) उन-उन नियमोंको धारण करते हुए उन-उन देवताओंके शरण हो जाते हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

उन-उन कामनाओंसे जिनका ज्ञान अपहृत हो गया है, ऐसे वे मनुष्य अपनी-अपनी प्रकृतिसे नियन्त्रित होकर (देवताओंके) उन-उन नियमोंको धारण करते हुए उन-उन देवताओंके शरण हो जाते हैं।

English Meaning

Those whose wisdom has been rent away by this or that desire, go to other gods, following this or that rite, led by their own nature.

Those whose wisdom has been rent away by this or that desire, go to other gods, following this or that rite, led by their own nature.

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