अग्नि / आग्नेय काण्ड (१.१.५) वैदिक मंत्र
ॐ प्रेष्ठं वो अतिथिं स्तुषे मित्रमिव प्रियम् । अग्ने रथं न वेद्यम् ॥
ईश्वरीय ऊर्जा को एक प्रिय मित्र व अतिथि के रूप में अपने अन्तःकरण व गृह में ससम्मान स्थापित करना।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
ईश्वरीय ऊर्जा को एक प्रिय मित्र व अतिथि के रूप में अपने अन्तःकरण व गृह में ससम्मान स्थापित करना।
इस मंत्र से क्या होगा?
ईश्वरीय ऊर्जा को एक प्रिय मित्र व अतिथि के रूप में अपने अन्तःकरण व गृह में ससम्मान स्थापित करना
जाप विधि
अतिथि-सत्कार के समय अथवा देव-आवाहन के विशेष पर्वों पर सुमधुर साम-स्वर में गान।
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