ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
उद्देश्य अनुसार मंत्र
अग्नि / आग्नेय काण्ड (१.१.५)

अग्नि / आग्नेय काण्ड (१.१.५) वैदिक मंत्र

ॐ प्रेष्ठं वो अतिथिं स्तुषे मित्रमिव प्रियम् । अग्ने रथं न वेद्यम् ॥

ईश्वरीय ऊर्जा को एक प्रिय मित्र व अतिथि के रूप में अपने अन्तःकरण व गृह में ससम्मान स्थापित करना।

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारवैदिक मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

ईश्वरीय ऊर्जा को एक प्रिय मित्र व अतिथि के रूप में अपने अन्तःकरण व गृह में ससम्मान स्थापित करना।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

ईश्वरीय ऊर्जा को एक प्रिय मित्र व अतिथि के रूप में अपने अन्तःकरण व गृह में ससम्मान स्थापित करना

जाप विधि

अतिथि-सत्कार के समय अथवा देव-आवाहन के विशेष पर्वों पर सुमधुर साम-स्वर में गान।

विशेष टिप्पणियाँ

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