अग्नि / आग्नेय काण्ड (१.१.५) वैदिक मंत्र
ॐ प्रेष्ठं वो अतिथिं स्तुषे मित्रमिव प्रियम् । अग्ने रथं न वेद्यम् ॥
ईश्वरीय ऊर्जा को एक प्रिय मित्र व अतिथि के रूप में अपने अन्तःकरण व गृह में ससम्मान स्थापित करना।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
जप काउंटर लोड हो रहा है...
यह मंत्र क्यों?
ईश्वरीय ऊर्जा को एक प्रिय मित्र व अतिथि के रूप में अपने अन्तःकरण व गृह में ससम्मान स्थापित करना।
इस मंत्र से क्या होगा?
ईश्वरीय ऊर्जा को एक प्रिय मित्र व अतिथि के रूप में अपने अन्तःकरण व गृह में ससम्मान स्थापित करना
जाप विधि
अतिथि-सत्कार के समय अथवा देव-आवाहन के विशेष पर्वों पर सुमधुर साम-स्वर में गान।
विशेष टिप्पणियाँ
अलग-अलग श्रेणियों से
हर श्रेणी से एक चुनिंदा मंत्र — नया खोजें
तत्त्वमसि
stotra mantraदारिद्र्य-दुःखौघ-तमोऽपहन्त्रि त्वत्-पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व । दीनार्ति-विच्छेदन-हेतुभूतैः कृपाकटाक्षैरभिषिञ्च मां श्रीः ॥ 27
shanti mantraॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
ugra mantraॐ क्रीं हूं क्रीं सर्व शत्रु स्तंभिनी घोर कालिकायै फट्
dhyan mantraकस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं नासाग्रे नवमौक्तिकं करतले वेणुं करे कङ्कणम्। सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावलिं गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः॥
beej mantraक्लीं