मन / शिवसंकल्प सूक्त (३४.४) वैदिक मंत्र
ॐ येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम् । येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।
त्रिकाल-ज्ञान की क्षमता का विकास, अहंकार का शमन, यज्ञीय जीवन-पद्धति का अनुसरण एवं पारलौकिक ज्ञान।
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यह मंत्र क्यों?
त्रिकाल-ज्ञान की क्षमता का विकास, अहंकार का शमन, यज्ञीय जीवन-पद्धति का अनुसरण एवं पारलौकिक ज्ञान।
इस मंत्र से क्या होगा?
त्रिकाल-ज्ञान की क्षमता का विकास, अहंकार का शमन, यज्ञीय जीवन-पद्धति का अनुसरण एवं पारलौकिक ज्ञान
जाप विधि
यज्ञीय कर्मकाण्ड या दैनिक उपासना की पूर्णाहुति के समय अग्नि के समक्ष बैठकर सस्वर पाठ।
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ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवागँसस्तनूभिः । व्यशेम देवहितं यदायूः । स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
kavach mantraनासां वैवस्वत: पातु मुखं मे भास्कर: सदा । नाभिं गृहपति: पातु मन्द: पातु कटिं तथा । पदौ मन्दगति: पातु सर्वांग पातु पिप्पल: । आंगो पांगानी सर्वानी रक्षे में सूर्य नंदन इत्तेत कवच देव पठे सूर्य सुतस्य यह नतस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्य जह व्यय जन्म द्वितीय मृत्यु स्थान गतो पिवा कलस्थो गतो वापी सुप्रीतु सदाशनी अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्म द्वितीयगे। कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित्। इत्य तत कवचम दिव्यम सौरे निर्मित पुरा जन्म लग्न स्थिता दोषा सर्वान नाश्यते प्रभु इति शनि कवच संपूर्णं ॥ 20
sabar mantraगुरु गोरखनाथ की दुहाई। रोग भागे, ज्वर सिधाए। शब्द सांचा, पीर मेरा पावना 13
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