वामदेव फलरुद्रलोक को वापस न आने वाला स्थान क्यों बताया गया है?रुद्रलोक ऐसा स्थान बताया गया है जहाँ से जीव का पुनः संसार में आगमन नहीं होता।#रुद्रलोक#पुनरागमन नहीं#वामदेव
वामदेव फलवामदेव शिव की भक्ति से पाप कैसे दूर होते हैं?परमेश्वरपरायण होकर समाधि से वामदेव का ध्यान करने वाले भक्त विमल आत्मा और ब्रह्मनिष्ठ होकर पाप से छूटते हैं।#वामदेव भक्ति#पाप मुक्ति#समाधि
वामदेव फलवामदेव शिव का ध्यान करने से क्या फल मिलता है?वामदेव शिव का समाधि से ध्यान करने वाले भक्त पाप से छूटकर रुद्रलोक प्राप्त करते हैं।#वामदेव ध्यान#शिव भक्ति#पाप मुक्ति
वामदेव कुमारवामदेव से उत्पन्न चार कुमार कैसे थे?वे विशुद्ध आत्मा, ब्रह्मतेज से सम्पन्न, ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मातुल्य, वीर, अध्यवसायी और रक्तवर्ण वस्त्र-माला से विभूषित थे।#चार कुमार#विरजा#विबाहु
शिष्य परम्पराशैवी दीक्षा क्या बताई गई है?शैवी दीक्षा का अलग विधि-वर्णन यहाँ नहीं है; योगाचार्यों के शिष्य शैवी दीक्षा से सम्पन्न बताए गए हैं।#शैवी दीक्षा#शिष्य#भस्म
शिष्य परम्परायोगाचार्यों के शिष्यों के गुण क्या थे?योगाचार्यों के शिष्य धर्मात्मा, महान् ओजस्वी, विमल आत्मा, सिद्ध, ब्रह्मनिष्ठ, ज्ञान-योग में निरत, भस्म-विभूषित और शैवी दीक्षा से सम्पन्न थे।#योगाचार्य शिष्य#धर्मात्मा#ब्रह्मनिष्ठ
गुरु तत्व और गुरु कृपासद्गुरु में कौन से दो गुण होने चाहिए?सद्गुरु में दो गुण अनिवार्य हैं: (1) श्रोत्रिय — शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान, (2) ब्रह्मनिष्ठ — ब्रह्म का अपरोक्ष (साक्षात्) अनुभव।#सद्गुरु गुण#श्रोत्रिय#ब्रह्मनिष्ठ
शास्त्र ज्ञानउपनिषद में गुरु का महत्व क्या है?उपनिषदों में गुरु अनिवार्य है। मुण्डकोपनिषद (1/2/12) में श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाने का आदेश है। छान्दोग्य (6/14/2) में गुरु 'अंधे को मार्ग दिखाने वाला' है। श्वेताश्वतर (6/23) — ईश्वर और गुरु में समान भक्ति से ही उपनिषद-ज्ञान प्रकट होता है।#गुरु#उपनिषद#आचार्य