विस्तृत उत्तर
अतल लोक और नरक में मूलभूत और अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर है जिसे शास्त्र स्पष्ट रूप से स्थापित करते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णु पुराण में अतल सहित सातों अधोलोकों को बिल-स्वर्ग कहा गया है — ये भोग के स्थान हैं, दंड के नहीं। यहाँ के निवासियों का जीवन देवराज इंद्र के स्वर्गलोक से भी अधिक सुखमय और विलासितापूर्ण है। यहाँ रोग, बुढ़ापा, थकावट का अभाव है और असीमित भौतिक सुख हैं। इसके विपरीत नरक लोक वह स्थान है जहाँ पापी जीवात्माएं अपने दुष्कर्मों का दंड भोगने जाती हैं और वहाँ अत्यंत पीड़ा, यातनाएं और कष्ट होते हैं। नरक लोकों की स्थिति इन पातालों से भी नीचे तथा गर्भोदक सागर के ठीक ऊपर बताई गई है। तीसरा अंतर यह है कि अतल में जाने के लिए सकाम पुण्य कर्म होने चाहिए जबकि नरक में जाने के लिए पाप कर्म।
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