विस्तृत उत्तर
नाम जप और मंत्र जप दोनों ईश्वर उपासना हैं, परंतु सूक्ष्म भेद है:
नाम जप: भगवान का सीधा नाम — 'राम', 'कृष्ण', 'शिव'। कोई विधि नहीं, कोई बंधन नहीं, दीक्षा नहीं। भक्ति/प्रेम प्रधान। 'कलौ नामैव केवलम्' — कलियुग में नाम ही पर्याप्त।
मंत्र जप: विशिष्ट संस्कृत सूत्र — 'ॐ नमः शिवाय', बीज मंत्र। विधि-नियम, माला, दिशा, कुछ में दीक्षा। शक्ति/सिद्धि प्रधान।
विस्तृत तुलना पिछली एंट्री (Q497) में दी जा चुकी है।
सार: नाम = भक्ति मार्ग (प्रेम)। मंत्र = विधि मार्ग (शक्ति)। दोनों = ईश्वर प्राप्ति। कलियुग में नाम सर्वसुलभ और सर्वश्रेष्ठ।





