विस्तृत उत्तर
यह भारतवर्ष की सबसे विशिष्ट और अद्वितीय विशेषता है। केवल इसी भारत भूमि पर सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग — ये चारों युग अपना काल-चक्र पूरा करते हैं। अन्य किसी भी वर्ष या द्वीप में युग-व्यवस्था लागू नहीं होती — वहाँ सदैव त्रेता युग के समान एक-सा सुखद वातावरण रहता है। इसका कारण यह है कि भारतवर्ष एकमात्र कर्मभूमि है जहाँ धर्म और अधर्म दोनों का प्रभाव होता है और जहाँ युग के अनुसार धर्म का ह्रास और वृद्धि होती है। अन्य भोगभूमियों में चूंकि जीव केवल पुण्यों का भोग करते हैं और नए कर्म नहीं करते इसलिए वहाँ युग परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होती। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अन्य वर्षों के निवासियों को बिना कर्म किए ही छह प्रकार की सिद्धियाँ स्वतः प्राप्त हो जाती हैं।
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