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विस्तृत उत्तर
दशगात्र में प्रतिदिन दिए जाने वाले पिण्ड के चार भाग होते हैं। प्रथम और द्वितीय भाग प्रेत के नए सूक्ष्म शरीर, अर्थात पिण्डज देह, के अंगों का क्रमिक निर्माण करते हैं। तृतीय भाग यमराज के अनुचरों, यानी यमदूतों, को मिलता है, जिससे वे संतुष्ट रहते हैं और प्रेत को अकारण कष्ट नहीं देते। चतुर्थ भाग स्वयं प्रेत द्वारा उपभोग किया जाता है, जिससे उसे आंशिक क्षुधा-शांति और शरीर-निर्माण की प्रक्रिया सहने की ऊर्जा मिलती है।
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