विस्तृत उत्तर
देवी भागवत पुराण (नवम स्कंध, अध्याय ६ व ७) और ब्रह्म वैवर्त पुराण में यह आख्यान मिलता है।
सृष्टि के आरंभिक काल में, बैकुंठ लोक में भगवान श्रीहरि (विष्णु) के साथ उनकी तीन देवियाँ पत्नी रूप में निवास करती थीं — लक्ष्मी, गंगा और सरस्वती।
एक बार भगवान विष्णु गंगा की ओर विशेष प्रेम दृष्टि से देख रहे थे, जो सरस्वती को सहन नहीं हुआ। सरस्वती ने ईर्ष्या और क्रोध के वशीभूत होकर लक्ष्मी से शिकायत की, परंतु लक्ष्मी शांत रहीं।
सरस्वती ने क्रोधित होकर लक्ष्मी को श्राप दे दिया कि वे असंवेदनशील हैं, इसलिए उन्हें पृथ्वी पर एक वृक्ष (तुलसी) और नदी (पद्मावती) बनना पड़ेगा। यह देखकर गंगा ने हस्तक्षेप किया और सरस्वती को श्राप दिया कि उन्हें पृथ्वी पर एक नदी (सरस्वती नदी) के रूप में बहना पड़ेगा और मनुष्यों के पाप धोने पड़ेंगे। प्रत्युत्तर में सरस्वती ने भी गंगा को नदी बनकर पृथ्वी पर उतरने का श्राप दे दिया।
यह कथा क्रोध और ईर्ष्या के दुष्परिणामों का भी दार्शनिक संदेश देती है।





