विस्तृत उत्तर
इस भयंकर विवाद को देखकर भगवान विष्णु ने हस्तक्षेप किया और नियति का विधान तय किया:
लक्ष्मी का पूर्ण अंश बैकुंठ में विष्णु के ही साथ रहेगा, क्योंकि उनका स्वभाव सात्त्विक, शांत और क्रोध-रहित है।
गंगा अपने पूर्ण अंश के साथ भगवान शिव के पास जाएँगी और उनकी जटाओं में स्थान पाएंगी।
सरस्वती को संबोधित करते हुए विष्णु ने कहा, 'हे भारती! गंगा के श्राप के कारण तुम्हें अपने एक अंश से भारतवर्ष में नदी रूप में अवतरित होना पड़ेगा। परंतु अपने पूर्ण अंश से तुम अब ब्रह्मलोक जाओ और भगवान ब्रह्मा की पत्नी (शक्ति) बनो।'
इसीलिए विष्णु पुराण और अन्य ग्रंथों में उल्लेख है कि विष्णु ने सरस्वती को अपनी जिह्वा (Tongue of Vishnu) में स्थान दिया, जबकि उनका एक स्वरूप ब्रह्मा की शक्ति बनकर सृष्टि के निर्माण में सहायक हुआ, और तीसरा स्वरूप पृथ्वी पर सरस्वती नदी के रूप में प्रवाहित हुआ।





