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विस्तृत उत्तर
द्रष्टा (देखने वाला) vs दृश्य (जो दिखता) — मूल भेद:
पतंजलि
- ▸(2.17): 'द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः' — 'द्रष्टा+दृश्य संयोग = दुख कारण।' भेद = मुक्ति।
- ▸(1.3): 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' — ध्यान = द्रष्टा स्वरूप।
कैसे अनुभव
- 1विचार = दृश्य, 'मैं' = द्रष्टा: 'विचार आ रहा' → कौन देख रहा? = मैं (आत्मा) → भेद!
- 2शरीर = दृश्य: 'हाथ दर्द हो रहा' → कौन जानता? = मैं → शरीर ≠ मैं।
- 3भावना = दृश्य: 'क्रोध आया' → कौन देख रहा? = मैं → क्रोध ≠ मैं।
- 4अभ्यास: ध्यान = 'सब देख रहा हूं — विचार/शरीर/भावना — मैं = केवल देखने वाला।'
रमण: 'मैं कौन?' → 'मैं = शरीर नहीं, मन नहीं, बुद्धि नहीं' → 'मैं = द्रष्टा = आत्मा।'
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