विस्तृत उत्तर
दुर्गा सप्तशती के रहस्यों का वर्णन कीलक स्तोत्र और शाक्त आगम परंपरा में मिलता है:
1कीलक रहस्य
सप्तशती के मंत्रों में 'कील' (खूँटी) लगी है — इसका अर्थ है कि इन मंत्रों की शक्ति बंद है। पाठ से पहले कीलक स्तोत्र पढ़कर विकीलन (कील खोलना) करना पड़ता है। बिना विकीलन के पाठ अपूर्ण माना जाता है।
कीलक में मार्कंडेय ऋषि ने स्वयं कहा है:
> 'मन्त्रस्यास्य पुरश्चर्यां विधाय स्वात्मनः स्थिरः। पश्चाद् यतेत सिद्ध्यर्थं सर्वकामसमृद्धये।'
2तीन चरित्र और तीन देवियाँ
सप्तशती में तीन देवियाँ — महाकाली (तम), महालक्ष्मी (रज), महासरस्वती (सत्व) — वास्तव में एक ही परम शक्ति के तीन रूप हैं। यह त्रिगुण दर्शन का प्रतीक है।
3असुर — मन के शत्रुओं का प्रतीक
- ▸मधु-कैटभ = अहंकार (यानी मन की मोह और अज्ञान)
- ▸महिषासुर = पशु-वृत्ति (महिष = भैंस; अज्ञान और काम)
- ▸शुंभ-निशुंभ = अभिमान और आत्ममोह
- ▸रक्तबीज = विचारों की अनंत शाखाएं (एक से अनेक)
- ▸चंड-मुंड = राग-द्वेष
यह दर्शन है कि दुर्गा वास्तव में मन के भीतर की असुरी वृत्तियों का नाश करती है।
4'या देवी सर्वभूतेषु...' — सर्वभूतस्तुति का रहस्य
सप्तशती के 5वें अध्याय में 11 श्लोक हैं जिनमें देवी को सभी प्राणियों में अलग-अलग रूपों में देखा गया है:
> 'या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।'
— यह सर्वव्यापी देवी का दर्शन है — वह चेतना, शक्ति, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, तृष्णा — सभी रूपों में है।
5नवार्ण मंत्र का रहस्य
नवार्ण 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे' — में तीन देवियों के तीन बीज (ऐं-ह्रीं-क्लीं) एकत्र हैं।





