विस्तृत उत्तर
भगवद्गीता में पुनर्जन्म का सिद्धांत अनेक अध्यायों में विस्तार से समझाया गया है। यह गीता के मूल दार्शनिक सिद्धांतों में से एक है।
प्रमुख श्लोक
- 1गीता 2.13 — 'देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।' — जैसे शरीर में बालपन, यौवन और वृद्धावस्था आती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है। धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता।
- 1गीता 2.20 — 'न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।' — आत्मा न जन्मती, न मरती; यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत है।
- 1गीता 2.22 — वस्त्र परिवर्तन का प्रसिद्ध उदाहरण (पूर्व प्रश्न में वर्णित)।
- 1गीता 4.5 — कृष्ण ने अपने और अर्जुन के बहुत जन्मों का उल्लेख किया।
- 1गीता 8.6 — 'यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।' — अंतिम समय का भाव अगला जन्म निर्धारित करता है।
- 1गीता 15.8 — 'शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः। गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्।।' — जैसे वायु सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाती है, वैसे ही जीवात्मा इंद्रियों और मन को एक शरीर से दूसरे में ले जाती है।
- 1गीता 6.41-45 — असफल योगी पुण्यवान परिवार या योगी परिवार में जन्म लेता है और पूर्वजन्म के संस्कारों से पुनः योग की ओर आकर्षित होता है।
पुनर्जन्म से मुक्ति
गीता 8.15-16 में कहा गया है — 'मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः।।' — मुझे प्राप्त करके महात्मा पुनर्जन्म रूपी दुःखालय में नहीं आते।
ब्रह्मलोक तक सभी लोक पुनरावर्ती (वापस आने वाले) हैं, परंतु भगवान को प्राप्त करने पर पुनर्जन्म नहीं होता (गीता 8.16)।





