विस्तृत उत्तर
हरे कृष्ण महामंत्र गौड़ीय वैष्णव परंपरा (चैतन्य महाप्रभु) का सबसे महत्वपूर्ण मंत्र है। कलिसंतरण उपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद का एक लघु उपनिषद) में इसका उल्लेख मिलता है।
मूल मंत्र (16 शब्द)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।'
तीन शब्दों का अर्थ
- 1हरे (Hare) — 'हर' = ईश्वर की आनंददायिनी शक्ति (ह्लादिनी शक्ति)। 'हरे' = हे हरि/हरा! (संबोधन)। गौड़ीय वैष्णव परंपरा में 'हरा' = राधा (कृष्ण की शक्ति)। अतः 'हरे' = हे राधे! या हे ईश्वरीय शक्ति!
- 1कृष्ण (Krishna) — 'कृष्' = सबको आकर्षित करने वाला। कृष्ण = सर्वाकर्षक परम पुरुषोत्तम भगवान। 'कृष्' (अस्तित्व) + 'ण' (आनंद) = जिसका अस्तित्व ही आनंद है।
- 1राम (Rama) — 'रम्' = आनंद देने वाला। राम = जो सबको आनंद देता है। यहां 'राम' = कृष्ण का ही रूप (गौड़ीय मत); कुछ परंपराओं में दशरथ पुत्र राम।
16 शब्दों का सामूहिक अर्थ
यह आत्मा की ईश्वर से पुकार है:
हे ईश्वरीय शक्ति (राधा/हरा)! हे सर्वाकर्षक कृष्ण! हे आनंददायक राम! कृपया मुझे अपनी भक्ति सेवा में लगा लो। मैं माया में भटक रहा हूं — मुझे अपनी शरण दो।
कलिसंतरण उपनिषद में
नारद ने ब्रह्मा से पूछा — कलियुग में मोक्ष का उपाय? ब्रह्मा ने कहा — 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण...' इन 16 नामों के जप से कलियुग का कलुष नष्ट होता है। इससे परे कोई उपाय नहीं।
ध्यान दें: कलिसंतरण उपनिषद एक लघु उपनिषद है। कुछ विद्वान इसे प्राचीन मानते हैं, कुछ इसे बाद का (मध्यकालीन) रचित मानते हैं। गौड़ीय वैष्णव परंपरा में यह अत्यंत प्रामाणिक है।
चैतन्य महाप्रभु (1486-1534 ई.) ने इस महामंत्र को जन-जन तक पहुंचाया। ISKCON (इस्कॉन) ने इसे विश्वभर में प्रचारित किया।





