विस्तृत उत्तर
जैन धर्म में 'घंटाकर्ण महावीर' ५२ वीरों (रक्षक देवों) में से एक हैं। जैन परंपरा के अनुसार वे पूर्वजन्म में श्रीनगर के एक पुण्यात्मा क्षत्रिय राजा 'तुंगभद्र' थे, जिन्होंने तीर्थयात्रियों की रक्षा करते हुए प्राण त्यागे। उनकी भूमिका तांत्रिक रक्षक, जैन धर्म के विरोधियों से सुरक्षा, सुख-समृद्धि और महामारी से रक्षा की है। गुजरात में महुड़ी जैन तीर्थ उनका प्रमुख मंदिर है। काली चौदस पर हवन उनकी उपासना का विशेष अंग है।
हिंदू पुराणों का घंटाकर्ण पूर्वकाल में पिशाच था जो शिवगण बना — ये दोनों ऐतिहासिक रूप से भिन्न सत्ताएँ प्रतीत होती हैं।
तथापि दोनों परंपराओं में एक गहन समानता है — 'तीव्र रक्षक देवता' की छवि। जैन तंत्र में भी रक्षा के लिए घंटाकर्ण का आह्वान विधि-विधान से होता है। दोनों परंपराओं में वे दुष्ट शक्तियों, रोगों और मानसिक भयों के नाशक हैं।





