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विस्तृत उत्तर
ब्रह्मांड पुराण और वायु पुराण में जनलोक के स्वयं के विस्तार, मोटाई या घनत्व का भी उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार जनलोक लगभग एक लाख योजन मोटा बताया गया है। यह विशाल विस्तार जनलोक को साधारण भौतिक ग्रह से अलग एक सूक्ष्म और पारलौकिक आयाम के रूप में स्थापित करता है।
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