विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण, भागवत पुराण और अन्य शास्त्रों के कर्म-सिद्धांत के अनुसार अतल लोक में वे जीवात्माएं प्रवेश करती हैं जिन्होंने अपने पूर्व जन्मों में अत्यधिक सकाम पुण्य कर्म और कठोर तपस्या तो की है परंतु उनका उद्देश्य कभी भगवान की अनन्य भक्ति या मोक्ष प्राप्त करना नहीं था। ऐसे प्राणी जो पूर्णतः राजसिक और तामसिक अहंकार से ग्रसित होते हैं, जो भौतिक संपदा, स्वर्ण और शारीरिक भोगों की तीव्र लालसा रखते हैं और जिन्होंने तपस्या या दान के माध्यम से भारी कार्मिक पुण्य इकट्ठा कर लिया है वे मृत्यु के पश्चात अतल आदि लोकों में भेजे जाते हैं। यहाँ का जीवन अज्ञानता में व्यतीत होता है। अतल लोक का अर्थ ही है — ऐसा स्थान जहाँ आत्मा का कोई वास्तविक या ठोस आध्यात्मिक आधार नहीं होता।
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