विस्तृत उत्तर
जब ब्राह्मणी को अपना पुत्र नहीं मिला, तो उसने अन्न-जल त्याग कर रात भर भगवान गणेश की प्रतिमा के समक्ष करुण पुकार की। उसके द्वारा किए गए संकष्टी चतुर्थी (सकट चौथ) के व्रत का अमोघ प्रभाव ऐसा था कि दूसरे दिन प्रातःकाल जब कुम्हार ने भट्टी खोली, तो सारे बर्तन पक चुके थे, परंतु आग का प्रभाव उस बालक पर सर्वथा शून्य था और वह वहाँ सुरक्षित खेल रहा था।





