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विस्तृत उत्तर
महाभारत के अनुसार पितर निर्जीव सत्ता नहीं हैं, बल्कि सजीव चेतना हैं। वे अपने वंशजों के कर्मों पर निरंतर दृष्टि रखते हैं। जब वंशज धर्म, श्राद्ध और अच्छे कर्म करते हैं, तो पितर तृप्त होते हैं। जब वंशज धर्म से भटकते हैं, श्राद्ध की उपेक्षा करते हैं या अधर्म करते हैं, तो पितर अशांत हो जाते हैं।
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