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विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में पाँच प्रकार के महापातकों का वर्णन है, जिन्हें करने वाला जीवात्मा पहले भयंकर नरकों की यातना भोगता है और फिर प्रेत बनता है। ये महापातक हैं: ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्ण की चोरी, गुरुपत्नी गमन और गोहत्या। इन पापों में जीव धर्म से अत्यंत दूर चला जाता है और उसका सूक्ष्म शरीर भारी तामसिक संस्कारों से भर जाता है। नरकों की यातना के पश्चात ऐसा पापी जीव प्रेत योनि में आता है और वायव्य शरीर में भूख-प्यास, असंतोष और अतृप्ति का कष्ट भोगता है।
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