विस्तृत उत्तर
कलावा (मौली/रक्षा सूत्र) बाँधना हिन्दू धर्म की अत्यन्त प्राचीन परम्परा है जो वैदिक काल से चली आ रही है।
कलावा क्या है
लाल-पीले (कभी लाल-सफेद) सूती धागे को बटकर बनाया गया पवित्र सूत्र = कलावा/मौली/रक्षा सूत्र। यह कलाई (कलाई+वा = कलावा) पर बाँधा जाता है।
परम्परा का उद्गम
1वैदिक यज्ञ परम्परा
सबसे प्राचीन उद्गम: वैदिक यज्ञ करवाने से पूर्व यजमान (यज्ञ करवाने वाला) और उसकी पत्नी की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधा जाता था। यह संकल्प और रक्षा का प्रतीक — 'इस यज्ञ के संकल्प में मैं बँधा हूँ।'
2रक्षाबंधन कथा (भविष्य पुराण)
देव-दानव युद्ध में इन्द्र की पत्नी शची (इन्द्राणी) ने इन्द्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधा। इन्द्र विजयी हुए। यहाँ से रक्षा सूत्र की परम्परा।
3महाभारत
द्रौपदी ने कृष्ण की कलाई पर वस्त्र का टुकड़ा बाँधा (रक्षा भाव से) — कृष्ण ने चीरहरण में द्रौपदी की रक्षा की।
मंदिर में कलावा बाँधने का विधान
4पूजा/संकल्प का प्रतीक
मंदिर में पूजा करवाने पर पुजारी कलावा बाँधता है = 'आपने यह पूजा का संकल्प लिया — यह उसका प्रमाण और रक्षा कवच है।'
5मंत्र
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।'
— 'जिस रक्षा सूत्र से बलशाली दानवराज बलि बाँधे गए, उसी से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षा! अचल रहो, अचल रहो।'
6किस हाथ पर
- ▸पुरुष: दाहिने हाथ (दक्षिण = शुभ)
- ▸स्त्री: बाएं हाथ (वाम)
- ▸कुछ परम्पराओं में: दोनों को दाहिने पर
7रंग का अर्थ
- ▸लाल = शक्ति, रक्षा, अग्नि तत्व
- ▸पीला = समृद्धि, ज्ञान, बृहस्पति
- ▸लाल+पीला = शक्ति+समृद्धि संयुक्त
8उतारने का नियम
- ▸कलावा स्वतः टूट जाए तो उतारें
- ▸अन्यथा मंगलवार या शनिवार को उतारकर पीपल/बरगद की जड़ में बाँधें
- ▸कूड़ेदान में न फेंकें — पवित्र वस्तु है





