विस्तृत उत्तर
पूजा से मोक्ष का प्रश्न अत्यंत गहरा है। शास्त्र इसे चरणबद्ध रूप में समझाते हैं:
भागवत पुराण (1.2.6)
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सम्प्रसीदति।।'
— वह धर्म श्रेष्ठ है जिससे निष्काम, अप्रतिहत भक्ति हो और आत्मा प्रसन्न हो — यही मोक्ष का मार्ग है।
भगवद्गीता (18.65-66) — मोक्ष का वचन
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।'
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।'
— सभी धर्मों को त्यागकर केवल मुझे शरण लो — मैं सभी पापों से मुक्त करूंगा। यह भगवान का मोक्ष-वचन है।
पूजा से मोक्ष की प्रक्रिया
1साकार से निराकार की यात्रा
पूजा का आरंभ मूर्ति के माध्यम से होता है — यह साकार भक्ति है। क्रमशः यह निराकार ब्रह्म-चिंतन में परिवर्तित होती है। यही मोक्ष की ओर यात्रा है।
2कर्म-क्षय
विष्णु पुराण (6.8.13): नित्य पूजा और भगवन्नाम-जप से संचित कर्म क्षय होते हैं। कर्म-क्षय मोक्ष का द्वार है।
3निष्काम भक्ति
भागवत (2.4.15): फल की इच्छा के बिना की गई पूजा 'निष्काम कर्म' है — यही मोक्ष की सीधी राह है।
4अहंकार-विसर्जन
पूजा में नित्य समर्पण से अहंकार घटता है। मोक्ष = अहंकार का पूर्ण विसर्जन और ब्रह्म में लीनता।
महत्वपूर्ण
शास्त्रों के अनुसार केवल पूजा नहीं — निष्काम पूजा + ज्ञान + वैराग्य — तीनों मिलकर मोक्ष देते हैं। केवल कर्मकांड पर्याप्त नहीं।





