विस्तृत उत्तर
मंत्र जप से आत्मिक शक्ति वृद्धि का वर्णन भागवत पुराण और भगवद् गीता में है:
भगवद् गीता (17.14-16) — तप के तीन रूप
- 1कायिक तप — शरीर का तप (उपवास, ब्रह्मचर्य)
- 2वाचिक तप — वाणी का तप (मंत्र जप, सत्य वचन)
- 3मानस तप — मन का तप (मौन, ध्यान)
जप = वाचिक तप। तप = शक्ति। अतः जप = शक्ति का अर्जन।
आत्मिक शक्ति के रूप
1संकल्प शक्ति
जो प्रतिदिन एक संकल्प (जप) पूरा करता है — उसकी संकल्प शक्ति बढ़ती है। छोटे-छोटे संकल्प पूरे करना = बड़े संकल्पों की नींव।
2धारण शक्ति (ओज)
tंत्र शास्त्र: ब्रह्मचर्य + जप = ओज। ओज शरीर और मन दोनों को शक्तिशाली बनाता है।
3चित्त की शुद्धि
जप से चित्त शुद्ध होता है — शुद्ध चित्त में ईश्वर की शक्ति का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखता है।
4अभय
भागवत: 'जिसे ईश्वर का बल मिल गया — उसे क्या भय।' भय का नाश = आत्मिक शक्ति।
5दिव्य तेज
नित्य साधक के चेहरे पर 'तेज' — एक विशेष आभा — दिखती है। यह ओज और आत्मिक शक्ति का प्रकटन।





