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आत्मिक शक्ति📜 भागवत पुराण, तंत्र शास्त्र — आत्म शक्ति, भगवद् गीता (17.14-16)2 मिनट पठन

मंत्र जप से आत्मिक शक्ति कैसे बढ़ती है?

संक्षिप्त उत्तर

आत्मिक शक्ति कैसे बढ़ती है: गीता 17.16 — जप वाचिक तप है। तप से शक्ति अर्जन। संकल्प शक्ति बढ़ती है, ओज बढ़ता है (ब्रह्मचर्य + जप), चित्त शुद्ध होता है, भय नष्ट होता है। नित्य साधक के चेहरे पर 'तेज' प्रकट होता है।

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विस्तृत उत्तर

मंत्र जप से आत्मिक शक्ति वृद्धि का वर्णन भागवत पुराण और भगवद् गीता में है:

भगवद् गीता (17.14-16) — तप के तीन रूप

  1. 1कायिक तप — शरीर का तप (उपवास, ब्रह्मचर्य)
  2. 2वाचिक तप — वाणी का तप (मंत्र जप, सत्य वचन)
  3. 3मानस तप — मन का तप (मौन, ध्यान)

जप = वाचिक तप। तप = शक्ति। अतः जप = शक्ति का अर्जन।

आत्मिक शक्ति के रूप

1संकल्प शक्ति

जो प्रतिदिन एक संकल्प (जप) पूरा करता है — उसकी संकल्प शक्ति बढ़ती है। छोटे-छोटे संकल्प पूरे करना = बड़े संकल्पों की नींव।

2धारण शक्ति (ओज)

tंत्र शास्त्र: ब्रह्मचर्य + जप = ओज। ओज शरीर और मन दोनों को शक्तिशाली बनाता है।

3चित्त की शुद्धि

जप से चित्त शुद्ध होता है — शुद्ध चित्त में ईश्वर की शक्ति का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखता है।

4अभय

भागवत: 'जिसे ईश्वर का बल मिल गया — उसे क्या भय।' भय का नाश = आत्मिक शक्ति।

5दिव्य तेज

नित्य साधक के चेहरे पर 'तेज' — एक विशेष आभा — दिखती है। यह ओज और आत्मिक शक्ति का प्रकटन।

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शास्त्रीय स्रोत
भागवत पुराण, तंत्र शास्त्र — आत्म शक्ति, भगवद् गीता (17.14-16)
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