विस्तृत उत्तर
यह एक आधुनिक और विवादित प्रश्न है — इस पर धार्मिक विद्वानों में मत भिन्नता है।
पक्ष (समर्थन में)
- 1ईश्वर सर्वव्यापक — ईशोपनिषद: *'ईशावास्यमिदं सर्वं'* — ईश्वर हर जगह है, मोबाइल में भी।
- 2भाव प्रधान — पूजा में श्रद्धा और भाव महत्वपूर्ण है, माध्यम नहीं। मूर्ति भी एक माध्यम है, फोटो भी।
- 3यात्रा/बाहर — यात्रा में मूर्ति संभव न हो तो मोबाइल फोटो देखकर प्रार्थना कर सकते हैं।
- 4मंत्र/चालीसा ऐप — मोबाइल से मंत्र/चालीसा पढ़ना/सुनना = ज्ञान का माध्यम।
विपक्ष (विरोध में)
- 1पवित्रता — मोबाइल अपवित्र स्थानों (बाथरूम, जमीन) पर भी जाता है। भगवान की तस्वीर वाला फोन बाथरूम ले जाना अनुचित।
- 2ध्यान भंग — मोबाइल पर notifications, calls आते हैं — पूजा में एकाग्रता भंग।
- 3स्क्रीन = प्रतिमा नहीं — प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति में दैवीय ऊर्जा होती है, स्क्रीन में नहीं।
- 4आदत — मोबाइल से पूजा की आदत = आलस्य, वास्तविक पूजा से दूरी।
संतुलित मत (अधिकांश विद्वान)
- ▸नियमित पूजा के लिए मूर्ति/तस्वीर (प्रिंट) ही उपयुक्त — मोबाइल विकल्प नहीं।
- ▸विशेष परिस्थिति (यात्रा, अस्पताल, बाहर) में मोबाइल से प्रार्थना = स्वीकार्य।
- ▸मोबाइल से मंत्र/चालीसा/गीता पढ़ना/सुनना = पूर्णतः सही (यह ज्ञान का माध्यम है)।
- ▸मोबाइल पर भगवान की wallpaper = सम्मान का प्रतीक, पूजा नहीं।
सार: भगवान भाव के भूखे हैं, माध्यम के नहीं — *'पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति'* (गीता 9.26)। पर जहाँ संभव हो, पारंपरिक पूजा (मूर्ति/तस्वीर) को प्राथमिकता दें।





