विस्तृत उत्तर
दस्तावेज़ में कहा गया है कि बाहरी तपोलोक तक पहुँचने की यात्रा वास्तव में मनुष्य के भीतर मूलाधार चक्र से उठकर आज्ञा चक्र तक पहुँचने की आंतरिक और अत्यंत दुष्कर योगिक यात्रा है। जब कोई साधक गहरे ध्यान में अपनी चेतना को मूलाधार चक्र से उठाते हुए आज्ञा चक्र तक ले आता है, तो वह मानसिक और आध्यात्मिक रूप से तपोलोक के स्तर की ऊर्जा और शुद्धता का अनुभव करने लगता है। इस अवस्था में साधक के भीतर की सभी भौतिक कामनाएँ, अज्ञान और विकार समाप्त हो जाते हैं और वह तपोलोक में रहने वाले वैराज देवगणों के समान अनासक्त, शांत और विकाररहित हो जाता है।
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