विस्तृत उत्तर
नैमित्तिक प्रलय में महर्लोक की स्थिति अत्यंत रहस्यमयी और विशेष है। यद्यपि महर्लोक इस प्रलय की अग्नि से भस्म नहीं होता परन्तु सङ्कर्षण की इस अग्नि के भयंकर ताप और धुएँ के कारण यह लोक निवासियों के रहने योग्य नहीं रह जाता। इस असहनीय स्थिति में महर्लोक में निवास करने वाले भृगु आदि महर्षि, पितृगण और प्रजापति इस लोक का परित्याग कर देते हैं और अपनी योग-शक्ति से जनलोक या सत्यलोक की ओर पलायन कर जाते हैं। ब्रह्मा की संपूर्ण रात्रि (कल्प के अंत) के दौरान महर्लोक पूर्णतः रिक्त अवस्था में महाकाश में स्थिर रहता है। इस प्रकार महर्लोक नैमित्तिक प्रलय में भस्म नहीं होता (यह अकृतक गुण) परंतु पूर्णतः निर्जन हो जाता है (यह कृतक गुण)। इसीलिए विष्णु पुराण (२.७.१३) इसे कृतकाकृतक कहता है।
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