विस्तृत उत्तर
यह शिष्य के समर्पण का प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण चरण है। पंचमहाभूतों के प्रतीकों के माध्यम से, शिष्य अपने संपूर्ण अस्तित्व — अपने शरीर, मन, हृदय, आत्मा और अहंकार — को उस विराट सत्ता को अर्पित कर देता है जिससे वह स्वयं उत्पन्न हुआ है।
यह 'तेरा तुझको अर्पण' के परम भाव की जीवंत अभिव्यक्ति है।
इस पूजा के द्वारा शिष्य न केवल देवताओं और गुरु-मंडल का आशीर्वाद प्राप्त करता है, बल्कि अपनी पात्रता भी सिद्ध करता है।





