विस्तृत उत्तर
पवित्री धारण की अंगुली शास्त्रों में स्पष्ट रूप से निर्धारित है। स्पष्ट उत्तर है कि पवित्री अनामिका अंगुली में पहनी जाती है। शास्त्रीय आधार के अनुसार अनामिका अंगुली में कुशा घास से निर्मित पवित्री अर्थात् अंगूठी धारण करना अनिवार्य है।
अनामिका अंगुली का परिचय देखें तो यह अंगूठे से तीसरी अंगुली होती है, अंग्रेजी में इसे ring finger कहते हैं, और यह सबसे छोटी अंगुली कनिष्ठा से एक पहले होती है। पाँच अंगुलियों का क्रम इस प्रकार है, पहले अंगूठा अर्थात् thumb, फिर तर्जनी अर्थात् index, फिर मध्यमा अर्थात् middle, फिर अनामिका अर्थात् ring जो हमारी अंगुली है, और अंत में कनिष्ठा अर्थात् little।
पवित्री का स्वरूप देखें तो इसकी सामग्री कुशा घास होती है, इसका आकार अंगूठी जैसा होता है, और इसका स्थान अनामिका अंगुली होती है। अनामिका को चुनने के कारण कई हैं। पहला कारण है शास्त्रीय निर्धारण, क्योंकि शास्त्रों ने स्पष्ट रूप से अनामिका को निर्धारित किया है, और कोई अन्य अंगुली नहीं चलेगी। दूसरा कारण है कि अनामिका श्राद्ध-कार्य की विशेष अंगुली है, क्योंकि अनामिका पितृ कार्य के लिए विशेष मानी गई है, और शास्त्रों ने इसी अंगुली को चुना है।
यहाँ अनिवार्य शब्द का विशेष महत्व है। शास्त्रों में अनिवार्य है शब्द शास्त्रीय है, अर्थात् यह कोई वैकल्पिक नियम नहीं है, और अनामिका में पवित्री पहनना आवश्यक है। अन्य पितृ-कार्य संकेत भी हैं जो ध्यान देने योग्य हैं। तर्पण में अंगूठा का उपयोग होता है, क्योंकि तर्पण करते समय जल को अंगूठे के मूल भाग जिसे पितृ तीर्थ कहा जाता है, उससे गिराया जाता है। अर्थात् तर्पण के समय जल अंगूठे से गिरता है, जबकि पवित्री अनामिका में पहनी जाती है, और दोनों अलग-अलग कार्य के लिए होते हैं।
श्राद्धकर्ता की पूर्ण तैयारी में पवित्री का स्थान महत्वपूर्ण है। पहले स्नान करना है, फिर श्वेत धोती धारण करनी है, फिर पवित्री अनामिका में पहननी है, फिर जनेऊ अपसव्य अवस्था में दाएं कंधे पर रखना है, और अंत में दक्षिण मुख होकर बैठना है। पवित्री कब पहननी है तो श्राद्ध आरंभ करने से पहले, स्नान और वस्त्र धारण के बाद, और सम्पूर्ण श्राद्ध के दौरान धारण करनी है।
पवित्री कब निकालनी है तो श्राद्ध की समाप्ति पर, विसर्जन के बाद। शास्त्रीय स्रोत के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, गरुड़ पुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति में श्राद्ध की सूक्ष्म विधि का विस्तार से वर्णन है। यह सूक्ष्म नियम सिद्ध करता है कि श्राद्ध में अंगुली का भी निश्चित विधान है, और हर अंगुली का अपना कार्य होता है। निष्कर्षतः पवित्री अनामिका अंगुली अर्थात् ring finger में पहनी जाती है, जो कुशा घास से निर्मित अंगूठी होती है, और श्राद्धकर्ता इसे अनिवार्य रूप से अनामिका में धारण करता है।
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