विस्तृत उत्तर
दीप जलाने की विधि और महत्व अग्नि पुराण और पद्म पुराण में विस्तार से वर्णित है:
दीप का महत्व
दीप अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाले ज्ञान का प्रतीक है। अग्नि पुराण में कहा गया है —
दीपो ज्ञानस्वरूपो हि ब्रह्मणः साक्षात् स्वरूपम्।' — दीप साक्षात् ज्ञान का और ब्रह्म का स्वरूप है।
दीप के प्रकार
| दीप | तेल/घी | देवता | विशेष फल |
|-----|---------|--------|------------|
| घी दीप | गाय का घी | सभी देवता | ज्ञान, सात्विकता |
| तिल तेल दीप | काला तिल तेल | शनि, काली, भैरव | शनि दोष निवारण |
| सरसों तेल दीप | सरसों | हनुमान, शिव | शत्रु नाश, रक्षा |
| चमेली तेल दीप | चमेली | हनुमान | बल, भक्ति |
| अरंडी तेल दीप | अरंडी | देवी, काली | तांत्रिक पूजा |
| कपूर | कपूर | सभी | वायु शुद्धि, नकारात्मकता नाश |
दीप जलाने की सही विधि
1बत्ती तैयार करना
रुई की बत्ती को घी में भिगोकर दीपक में रखें। बत्ती देवता की ओर होनी चाहिए।
2दीप जलाते समय मंत्र
> 'भो दीप देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत्।
> यावत्कर्म समाप्तिः स्यात् तावत् त्वं सुस्थिरो भव।'
— हे दीप! आप देवरूप हैं, कर्म के साक्षी हैं। जब तक पूजा पूरी न हो, स्थिर रहें।
3दीप का स्थान
- ▸देवता के दाहिनी ओर रखें (श्रेष्ठ)
- ▸या सामने
- ▸जमीन पर न रखें — चौकी या थाली पर
4बत्तियों की संख्या
- ▸1 बत्ती — नित्य पूजा
- ▸2 बत्ती — मांगलिक कार्य
- ▸5 बत्ती (पंचमुखी) — आरती, विशेष पूजा
- ▸7 बत्ती — महापूजा, अनुष्ठान
5दीप कभी न बुझाएं
फूँक मारकर दीप न बुझाएं — हाथ से पंखा करके या अंगुली और अंगूठे से बुझाएं।
संध्या दीप का महत्व
स्कंद पुराण: 'संध्याकाले तु यो दीपं ज्वालयेत् भक्तिमान् नरः। गृहे तस्य सदा लक्ष्मीः वसति नित्यं नारायणः।' — जो सायंकाल भक्ति से दीप जलाता है, उसके घर में लक्ष्मी और नारायण का वास होता है।





