विस्तृत उत्तर
प्रसाद वितरण का महत्व भागवत पुराण और विष्णु पुराण में वर्णित है:
1भगवान का आशीर्वाद
प्रसाद = 'प्र + साद' = विशेष प्रसन्नता। जो भोजन पहले भगवान को अर्पित हो, वह भगवान की प्रसन्नता लिए हुए होता है।
2गीता का आधार (4.24)
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविः...' — अर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है — जो खाया जाए वह ब्रह्म है। भगवान को अर्पित भोजन 'यज्ञशेष' बन जाता है।
3समता का भाव
प्रसाद सबको बाँटना — ऊँच-नीच का भेद मिटाना। सब एक ही भगवान के भक्त हैं।
4ऊर्जा का संचार
भागवत पुराण में कहा गया है — भगवान को अर्पित भोजन में विशेष दैवी ऊर्जा आ जाती है जो ग्रहण करने वाले को लाभकारी होती है।
5कृतज्ञता
प्रसाद ग्रहण करना — भगवान की देन के प्रति कृतज्ञता का भाव है।
प्रसाद ग्रहण का नियम
- ▸दाएं हाथ से ग्रहण करें
- ▸भूमि पर न गिरने दें
- ▸सबको समान रूप से वितरित करें
- ▸अस्वीकार न करें


