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पूजा रहस्य📜 भागवत पुराण, भगवद् गीता (3.13) — प्रसाद दर्शन1 मिनट पठन

पूजा के बाद प्रसाद क्यों बांटते हैं?

संक्षिप्त उत्तर

प्रसाद क्यों बाँटें: गीता 3.13 — यज्ञशेष खाने वाले पापों से मुक्त। ईश्वर की कृपा का विस्तार। समता — राजा और रंक एक साथ। यज्ञशेष सिद्धांत: पहले देव, फिर प्रसाद। सामुदायिक एकता। प्रसाद देने वाले को भी पुण्य।

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विस्तृत उत्तर

प्रसाद वितरण का दार्शनिक आधार भागवत पुराण और भगवद् गीता में है:

भगवद् गीता (3.13)

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।

— यज्ञशेष (प्रसाद) खाने वाले सज्जन सभी पापों से मुक्त होते हैं।

प्रसाद बाँटने के पाँच कारण

  1. 1ईश्वर की कृपा बाँटना: प्रसाद = भगवान की प्रसन्नता। इसे बाँटना = ईश्वर की कृपा का विस्तार।
  1. 1समता का भाव: प्रसाद सबको बाँटना — ऊँच-नीच का भेद मिटाता है। राजा और रंक एक ही थाल से प्रसाद।
  1. 1यज्ञशेष: भोजन से पहले देव को अर्पण — फिर प्रसाद ग्रहण। गीता: 'केवल अपने लिए पकाना पाप है।'
  1. 1सामुदायिक भावना: एक साथ प्रसाद ग्रहण — समाज को एकजुट रखता है।
  1. 1पुण्य का संचार: प्रसाद देने वाले को भी पुण्य मिलता है।

भागवत पुराण

प्रसादं नापि दातव्यं अपात्राय कदाचन।' — अपात्र को प्रसाद देना भी उचित नहीं — किंतु सभी को देना श्रेष्ठ।
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शास्त्रीय स्रोत
भागवत पुराण, भगवद् गीता (3.13) — प्रसाद दर्शन
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