विस्तृत उत्तर
प्रसाद वितरण का दार्शनिक आधार भागवत पुराण और भगवद् गीता में है:
भगवद् गीता (3.13)
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
— यज्ञशेष (प्रसाद) खाने वाले सज्जन सभी पापों से मुक्त होते हैं।
प्रसाद बाँटने के पाँच कारण
- 1ईश्वर की कृपा बाँटना: प्रसाद = भगवान की प्रसन्नता। इसे बाँटना = ईश्वर की कृपा का विस्तार।
- 1समता का भाव: प्रसाद सबको बाँटना — ऊँच-नीच का भेद मिटाता है। राजा और रंक एक ही थाल से प्रसाद।
- 1यज्ञशेष: भोजन से पहले देव को अर्पण — फिर प्रसाद ग्रहण। गीता: 'केवल अपने लिए पकाना पाप है।'
- 1सामुदायिक भावना: एक साथ प्रसाद ग्रहण — समाज को एकजुट रखता है।
- 1पुण्य का संचार: प्रसाद देने वाले को भी पुण्य मिलता है।
भागवत पुराण
प्रसादं नापि दातव्यं अपात्राय कदाचन।' — अपात्र को प्रसाद देना भी उचित नहीं — किंतु सभी को देना श्रेष्ठ।





