विस्तृत उत्तर
प्रत्येक शास्त्रोक्त रत्न अपने आप में एक महान भक्त के सर्वोच्च त्याग और भगवान की कृपा का अंश है।
इसी दिव्य उत्पत्ति के कारण उनमें दैवीय ऊर्जा को धारण करने की स्वाभाविक क्षमता होती है।
हम एक विशिष्ट देवी मंत्र का उपयोग करके, उस रत्न में सोई हुई दिव्य ऊर्जा को जागृत करते हैं, जो दैत्यराज बलि के यज्ञ के कारण उसमें पहले से ही सूक्ष्म रूप में विद्यमान है।
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