विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित कथा के अनुसार, रत्नों का उद्गम परम भक्त दैत्यराज बलि के महायज्ञ से हुआ है।
जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार में बलि से तीन पग भूमि मांगी और दो पग में ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड नाप लिया, तब तीसरे पग के लिए बलि ने अपना मस्तक अर्पित कर दिया। भगवान के चरण स्पर्श से बलि का भौतिक शरीर पवित्र और देव-तुल्य हो गया।
उसी क्षण, उनका शरीर विभिन्न रत्नों में परिवर्तित होकर सम्पूर्ण भू-मंडल पर बिखर गया।
यह कथा स्थापित करती है कि प्रत्येक शास्त्रोक्त रत्न अपने आप में एक महान भक्त के सर्वोच्च त्याग और भगवान की कृपा का अंश है।





